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१५ अगस्त स्वतंत्रता दिन की शुभ कामनायें

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आज १५ अगस्त २०२०, आज अपने भारत देश को आजादी मिले ७३ साल पुरे हो गए. आज हम सभी भारतवासी ७४ वा स्वातंत्र्य दिन मना रहे है. पूरी दुनिया में फैली इस कोरोना महामारी के संक्रमण की वजह से हम सभी पर कुछ बंधन है,.  सभी नागरिक एक दूसरे से  सामाजिक दूरी बनाकर स्वतंत्रता का  यह उत्सव पूरे उत्साह के साथ मना रहे है एक दूसरे को हार्दिक बधाई दे रहे है.

 १५ अगस्त १९४७ – हमारे देश के इतिहास का सुन-हरा दिन है, क्योंकि इसी दिन अपना भारत देश अंग्रेजों के जुल्मी शासन से आजाद हुआ. १५ अगस्त १९४७ को पहली बार दिल्ली के लाल किले कि प्राचीर से हमारे देश के प्रथम पंत प्रधान पंडित जवाहरलाल नेहरू जीने (जिन्हे हम चाचा नेहरू के नाम से भी जानते है) भारत का तिरंगा ध्वज फहराया था. २०० साल से भारतवासी आजादी का जो सुन-हरा सपना देख रहे थे वह पुरा हुआ था.  ब्रिटिश संसद ने भारत के आख़िरी व्हाईसराय के रूप मे लॉर्ड माउंटबेटन को भारत भेजा. ३० जून १९४८ तक भारत की सत्ता भारतीय लोगों को सौंप ने का अधिकार लॉर्ड माउंटबेटन को दिया था. माउंटबेटन ने ही भारत की आजादी के लिए १५ अगस्त की तारीख चुनी थी.  कुछ इतिहास कारों का यह भी मानना है कि सी राजगोपालाचारी के सुझाव पर लॉर्ड माउंटबेटन ने इस तारीख को चुना था. सी राजगोपालाचारी का कहना था कि अगर ३०जून१९४८ तक इंतजार किया गया तो भारत मे चालू अवज्ञा आंदोलन कि वजह से हस्तांतरित करने के लिए कोई सत्ता शेष नहीं होगी. 

अगस्त १९४२ में महात्मा गांधी जी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ कि शुरुआत कि तथा स्वदेसीआंदोलन, सामुदायिक अवज्ञा आंदोलन और करो या मरो आंदोलन कि घोषणा की. महात्मा गाँधीजी के मार्गदर्शन और नेतृत्व में कई लोग अपनी और अपने परिवार कि चिंता किये बगैर आने वाले पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य के लिये स्वतंत्रता संग्राम मे शामिल हुये. कई लोगो ने अहिंसक प्रतिरोध और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में हिस्सा लिया.

एक तरफ गांधी जी का अहिंसक आंदोलन चालू था वही दूसरी ओर कई क्रांतीकारीयो ने भी अपनी जान कि पर्वा किये बगैर ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ सशस्त्र आंदोलन कीया. इस कि शुरुवात हुई १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से. १८५७ का विद्रोह, जो मेरठ में सैन्य  कर्मियों की बगावत से शुरू हुआ, जल्दी ही आगे फैल गया और इससे ब्रिटिश शासन को एक गंभीर चुनौती मिली. क्रांतिकारी आंदोलन का समय सामान्यतः लोगों ने सन् १८५७ से १९४२ तक माना है. भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग है. भारतीय स्वतंत्रता के सशस्त्र संग्राम की विशेषता यह रही है कि क्रांतिकारियों के मुक्ति प्रयास कभी शिथिल नहीं हुए.  स्वतंत्रता संग्राम में चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, भगत सिंग, सुखदेव, राजगुरू, वीर सावरकर जैसे कई वीर सपूतोने भारत मां के लिये अपने जीवन कि आहुती दि.

आजादी के इस सफर में एक और नाम हम नही भूल सकते वो है नेताजी सुभाषचंद्र बोस का. कोलकाता के स्वतन्त्रता सेनानी देशबंधु चित्तरंजन दास के कार्य से प्रेरित होकर सुभाषचंद्र जी स्वतंत्रता संग्राम मे शामील हुये. अपने कार्य कर्तुत्व से सुभाष जी दिसंबर १९२७ मे कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और १९३८ मे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गये. धीरे – धीरे कांग्रेस से सुभाष जी का मोह भंग होने लगा. १६ मार्च १९३९ मे सुभाष जी ने कांग्रेस से अपने पद का इस्तिफा दे दिया. 

सुभाष बाबू ने आजादी के आंदोलन को एक नयी राह देते हुये युवाओं को सम्मेलीत किया. उन्होने आशियाई देशोमे रहने वाले भारतीय मूल के लोगों को अपने इस आंदोलन मे सामील किया. पूर्वी एशिया पहुँचकर सुभाष ने सर्वप्रथम वयोवृद्ध क्रांतिकारी रास बिहारी बोस से मिले, रास बिहारी बोस जी ने स्वेच्छा से स्वतंत्रता परिषद का नेतृत्व सुभाष को सौंपा था. २९ मई १९४२ के दिन, सुभाष जर्मनी के सर्वोच्च नेता एडॉल्फ हिटलर से मिले। लेकिन हिटलर को भारत के विषय में विशेष रुचि नहीं थी। उन्होने सुभाष को सहायता का कोई स्पष्ट वचन नहीं दिया. नेताजी सुभाष जापान के प्रधानमंत्री जनरल हिदेकी तोजो से भी मिले,  नेताजी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर जापान के प्रधानमंत्री ने उन्हें सहयोग करने का आश्वासन दिया. ५ जुलाई १९४३ को सिंगापुर में ‘आजाद हिंद फ़ौज’ का गठन किया.

२१ अक्टूबर १९४३ को अस्थायी स्वतंत्र भारत सरकार की स्थापना कर नेताजी ने आजादी प्राप्त करने के संकल्प को साकार किया. वे खुद इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमन्त्री बने. इस सरकार को कुल नौ देशों ने मान्यता दी. नेताजी आज़ाद हिन्द फौज के प्रधान सेनापति भी बन गये. पूर्वी एशिया के लोगों को साम्मेलीत कर उन्हे आजाद हिंद फौज मे शामिल होने और आर्थिक मदद देने का आवाहन किया. उन्होने अपने आवाहन मे यह संदेश भी दिया कि “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा”

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया. अपनी फौज को प्रेरित करने के लिये नेताजी ने ” दिल्ली चलो” का नारा दिया. दोनों फौजों ने अंग्रेजों से अंडमान और निकोबार द्वीप जीत लिये. नेताजी ने इन द्वीपों को “शहीद द्वीप” और “स्वराज द्वीप” का नया नाम दिया. दोनों फौजों ने मिलकर इंफाल और कोहिमा पर आक्रमण किया. लेकिन बाद में अंग्रेजों का पलड़ा भारी पड़ा और दोनों फौजों को पीछे हटना पड़ा.

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार के बाद, नेताजी को नया रास्ता ढूँढना जरूरी था. उन्होने रूस (रशिया) से सहायता माँगने का निश्चय किया था. १८ अगस्त १९४५ को नेताजी हवाई जहाज से मंचूरिया की तरफ जा रहे थे. इस सफर के दौरान वे लापता हो गये. ताइहोकू हवाई अड्डे के पास उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया.  भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार से प्राप्त दस्तावेज़ के अनुसार नेताजी की मृत्यु १८ अगस्त १९४५  को ताइहोकू के सैनिक अस्पताल में हुई थी.

देश के इन्ही सपूतोंको याद करते हुये आईये हम सब मिल कर उनके सपनों के सशक्त और समृद्ध भारत का निर्माण करने का संकल्प करे.

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